॥ 卐 ॥ॐ गुरुवे श्री नान्तिने नमः॥ 卐 ॥
अखिल भारतीय नान्तिन महाराज आश्रम धार्मिक न्यास

ॐ पारे ब्रह्मणि मग्नाय, धीराय मित भाषिणे ।
द्वैता द्वैत बोधाय गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥१॥
विभेति यस्मात् जराः मृत्यु कालो न कलयते क्वचित् ।
तस्मै योगीश पूज्याय गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥२॥
माया मात्रमिंद सर्व, दृश्यते श्रूयते हि यत् ।
ब्रह्मण्येव सदा रमते, गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥३॥
अध्यारोपा पवादभ्यां, येन ब्रह्मवै चिन्तितम् ।
समं पष्यति सर्वत्र, गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥४॥
तस्यै वांशहि जीवोऽयं, मायया बहुरूप याया
काय क्लेषान्वहुन्भुक्ते, गुरूवे नान्तिने नमः ॥५॥
गुरोः शिक्षामि माँ शुद्धाँ यः चित्ते धारयिस्यति ।
न कदापि जगज्जालैः मोहमेस्यति सः नर ॥६॥

“परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर”

जब भगवान अपने भक्तों पर अतिसय कृपा करते हैं तब भगवान स्वयं गुरू रूप में अवतरित हो मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्य करते हैं। वैसे तो पूरे भारतवर्ष को अवतारों व गुरुओं ने अपनी कृपा से अभिभूत किया है परंतु इसमें हिमालय क्षेत्र पर उनकी विशेष कृपा रही है। इन अवतारों की श्रृंखला में एक विशेष संत प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद गुरुदेव श्री नान्तिन बाबा जी हुए, जो त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान थे। इन्होंने ६ – ७ वर्ष की उम्र में बालक ध्रुव की भांति अपने गृह गाँव ‘ रुअर ’ जिला मुरैना, मध्य प्रदेश का त्याग किया। तत्पश्चात वे अयोध्या होते हुए बद्रीनारायण हिमालय में पहुंचे तथा भगवान विष्णु द्वारा दीक्षित होकर हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों कुमाऊँ गढ़वाल व नेपाल में तप किया। कुकुड़ा माई, जिला बागेश्वर इनकी साधना का प्रमुख स्थान रहा, यहीं पर मैया ने पूज्य गुरुदेव को चतुर्भुज रूप में दर्शन देकर नवरात्रि में हवन, पूजन व भण्डारा करने के लिए कहा। इस प्रकार से कठिन साधना करते हुए पूज्य महाराज जी ने सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की। जो कोई साधारण मनुष्य भी महाराज जी की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृपा पा लेता तो उसके दैविक, दैहिक व भौतिक कष्टों का निवारण अनायास ही हो जाता।

पूज्य महाराज जी आयुर्वेद के भगवान थे, उनके अनुसार पृथ्वी पर कोई भी वनस्पति ऐसी नहीं है जिसका उपयोग आयुर्वेद में उपचार के तौर पर न हो। पूज्य महाराज जी कभी दर्शन से, कभी स्पर्श से, कभी प्राकृतिक चिकित्सा से, कभी दूध के पथ्य से, कभी आयुर्वेदिक दवाओं से, कभी वैदिक, संस्कृत या हिंदी के ग्रंथों के अनुष्ठान (विशेष पूजा) से शरणागत , दीन दुःखी, निराश, असहाय जनों पर अपनी असीम कृपा से उनका रोग, शोक, विपत्ति आदि घोर संकटों को दूर कर, सब को सुख शांति प्रदान करते थे । कितने मनुष्यों पर ही नहीं अपितु पशुओं पर अपनी कृपा बरसाई , उसकी गिनती कौन कर सकता है? कितने ही सुपात्र वैरागी धर्म परायण जनों (स्त्री पुरुष दोनों) को परम पद का अधिकारी बनाया कितने गृहस्थियों को धर्म आचरण का मार्ग दिखा कर उनका जीवन सफल किया, यह पूर्ण रूप से वे ही जान सकते थे।

नान्तिन बाबा जी के इन जन कल्याण के कार्यों में पूज्य डंडी स्वामी शंकरानंद गिरि जी महाराज (उस समय श्री शंकर ब्रह्मचारी ) जी पूर्ण समर्पण भाव से पूज्य नान्तिन बाबाजी के आदेशों का पालन करते थे। पूज्य स्वामी शंकरानन्द गिरी जी महाराज को पूज्य नान्तिन बाबाजी के इस जीवन में प्रथम दर्शन 11 वर्ष की उम्र में हुए। प्रथम दर्शन पर ही पूज्य शंकर महाराज जी को भारी जनसभा के बीच पूज्य नान्तिन बाबा जी की विशेष कृपा दृष्टि प्राप्त हुई। तत्पश्चात समय समय में नान्तिन बाबा जी के दर्शन होते रहे। 17 – 18 वर्ष की उम्र से पूज्य शंकर महाराज जी पूर्ण रूप से नांतिन बाबा जी की सेवा में समर्पित हुए और लगभग 45 वर्षों तक नांतिन बाबा जी का आशीर्वाद प्रत्यक्ष रूप से पाते रहे। पूज्य शंकर महाराज जी इस काल अवधि में नानतिन बाबा जी की कृपा से सब क्षेत्रों के ज्ञाता बने। सन 1986 में पूज्य नान्तिन बाबाजी के लौकिक शरीर के समाधिस्थ होने के पश्चात पूज्य दंडी स्वामी शंकरानन्द गिरि जी महाराज नानतिन बाबा जी के कार्यों को उनके ही आशीर्वाद से आगे बढ़ा रहे हैं। इसी क्रम में पूज्य शंकर महाराज जी ने सैकड़ों मंदिर और आश्रमों का जीर्णोद्धार और स्थापना की । जिनमें मुख्यतः श्री ज्ञानगम्येश्वर महादेव मंदिर प्राँगण श्यामखेत, श्री कुकुड़ा मैया मन्दिर बागेश्वर, श्री सिद्धेश्वर महादेव मन्दिर हलद्वानी उत्तराखंड, श्री दयामय अमर भैरव मन्दिर मिलक रामपुर उत्तर प्रदेश, श्री संकटहर महादेव मजुवाटॉप कर्मी बागेश्वर, वासुकिनाग बागेश्वर, श्री नर्मदेश्वर महादेव ग्रान्ट 12 लखीमपुर खीरी, डंडेश्वर महादेव झड़कोट हैं।

भविष्य में भी समाज की सेवा के कार्य सुचारू रूप से चलते रहें इसलिए पूज्य दंडी स्वामी शंकरानन्द गिरि जी महाराज ने श्रीमद् ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम हिमालय उत्तराखंड के संरक्षण में “ अखिल भारतीय नान्तिन महाराज आश्रम धार्मिक न्यास ” की स्थापना की है।