ॐ गुरुवे श्री नान्तिने नमः
अखिल भारतीय नान्तिन महाराज आश्रम धार्मिक न्यास

श्री गुरुदेव भगवान् की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे ।।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के अवगुण, क्षण में दूर करे ।। ॐ जय जगदीश हरे ।।
जो ध्यावे फल पावै, दुख विनसै मन का ।
सुख-सम्पति घर आवै, कष्ट मिटै तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी॥
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी ।। ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अन्तर्यामी॥
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता ॥
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपती।
किस विधि मिलउँ कृपामय, मुझको दो सुमती ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे॥
अपने हाथ बढ़ाओ, शरण पड़ा तेरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा ।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा ।। ॐ जय जगदीश हरे ॥
तन मन धन सब कुछ है तेरा, तेरा तुम को अर्पण ।।
प्रभु जी का प्रभु को समर्पण, क्या लागे मेरा ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥




श्री शिव जी की स्तुति

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥ १ ॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥
करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥ २ ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥ ३ ॥
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४ ॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥
त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥५॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ॥
चिदानंदसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६ ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।। ७ ।।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।। ८ ।।
श्लोक - रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।९।।




श्री हनुमान जी की आरती

आरति कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर काँपै, रोग दोष जाके निकट न झाँपै॥
अन्जनि पुत्र महा बलदाई, सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाये, लंका जारि सीय सुधि लाये॥
लंका-सो कोट समुद्र-सी खाई, जात पवन सुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर सब मारे, सिया राम जी के काज सँवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े धरणी पर, आनि संजीवन प्रान उबारे॥
पैठि पताल तोरी जम-कारे, अहिरावन की भुजा उखारे॥
बाँये भुजा असुरदल मारे, दाँये भुजा सन्त जन तारे॥
सुर नर मुनि आरती उतारे, जय जय जय हनुमान उचारे॥
कन्चन थार कपूर लौ छाई, आरति करत अंजना माई॥
जो श्री हनुमान जी की आरति गावै, बसि बैकुंठ परमपद पावै॥
लंका विध्वन्स कीन्हे रघुराई, तुलसीदास प्रभु कीरति गाई॥




स्वामी कार्तिकेय स्तोत्रम्

ॐ द्वि षड्भुजम् ष्न्नमुखं अम्बिकासुतम्
कुमारः मादित्य सहश्र तेजसम्
वन्दे मयूरासनम् मग्नि सम्भवम्
सेनान्य मध्याह मभिष्ठ सिद्धये ||१||
गांगेयम् वहनिगर्भम् शरवण जनितम्
ज्ञानशक्तिम् कुमारम्
ब्रह्म नियम् स्कन्ददेवं गुहाममलगुणम्
रुद्रतेज स्वरूपम
सेनानिम् तारकघनं गुरं मचल मतिम्
कार्तिकेयम् षड़ाशीयम्
सुभ्रमण्यम् मयूरध्वज रध सहितं देवदेवं नमामि ||२||
कनक कुण्डल मण्डित् ष्नमुखं
वनजराजि विराजित लोचनम्
निसितशस्त्र सरासन् धारिणम्
शरवणोदभव भज मीषसुतम् ||३||
प्रथमो ज्ञानशक्ति आत्मा द्वितीयः स्कन्दयेव च
अग्नि गर्भह त्रुटि यस्तु बाहुलेपः चतुर्थकः
गांगेयः पंचमः प्रोक्तः षष्ठः शरवणोदभव
सप्तमः कार्तिकेयश्च कुमारश्च अष्टमस्तथा
नवमः ष्नमुखः प्रोक्तः तारकारि स्मृतोदशः
एकादसश्च सेनानी गुहो द्वादश एव च
त्रयोदशः ब्रह्मचारी शिव तेज चुतुर्दशः
क्रौञ्चदारी पंचदशः षोडशः शिखीवाहन ||४।।




श्री दुर्गा मां की स्तुति

न मत्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥
जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।१३।।
शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमो स्तुते ॥१४।।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।।१५।।




जय ध्वनि

जय कारा-जोर से जै कहें

श्री दुर्गा देवी जी की जै - श्री चण्डिका देवी जी की जै
श्री चामुण्डा देवी जी की जै - श्री रक्त बीज विनाशनीदेवी जी की जै
साकम्बरी - चन्द्रघंटिका - महागौरी – सावित्री - नारायणी - माहेश्वरी
कौमारी- शैलपुत्रीदेवी - ब्रह्मचारिणी - शिवप्रिया- अम्बिका - सिद्धादात्रीदेवी
नारसिंघी - सिंगवाहनी- सर्वमंगला – मधुकैटभनाशनी - त्रिपुरसुन्दरी
रुद्राणी- धूमावती- भुवनेश्वरीदेवी - छिन्नमस्ता
कैलाशवासनी - महादेवी – महालक्ष्मीदेवीमहासर
दिव्यमूर्तीदेवी- क्रोधमूर्ति- कालधारीदेवी – रुद्ररूपादेवी – लहूजिह्वादेवी
घोररूपा- कालकूटादेवीच - मुण्डधारीदेवी - विश्वेश्वरी - श्री कुकड़ादेवी
बगलामुखी - सूर्यादेवी - श्रीमतेश्वरी - श्री जन्मदायनी माता
श्री गणेशजी की जै
श्री रमापति विष्णु भगवान जी की जै - श्री उमापति महादेव जी - श्रीचतुरमुखी ब्रह्मा जी की जै |
श्री राधापति श्री कृष्ण चन्द्र जी - श्री सीतापति रामचन्द्र जी
श्री डण्डे वर महादेव जी – श्री ज्ञान गम्येश्वर महादेव जी की – श्री सिद्धेश्वर महादेव जी की
श्री पवनसुत हनुमान जी की जै श्री बीर भैरव नाथ जी - श्री चौरासि सिद्धों की जै ,
श्री तेंतीस कोटि देवताओं की जै - श्री अट्ठासी हजार मुनियों की जै
श्री भागीरथी गंगा जी की जै, श्री बद्री विशाल लाल जी की जै
श्री गुरुदेव भगवान की जै, श्री नान्तिन महाराज जी की जै ।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वम् मम देव देव ।।




श्री नान्तिन पंचक

ॐ पारे ब्रह्मणि मग्नाय, धीराय मित भाषिणे ।
द्वैता द्वैत बोधाय गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥१॥
विभेति यस्मात् जराः मृत्यु कालो न कलयते क्वचित् ।
तस्मै योगीश पूज्याय गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥२॥
माया मात्रमिंद सर्व, दृश्यते श्रूयते हि यत् ।
ब्रह्मण्येव सदा रमते, गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥३॥
अध्यारोपा पवादभ्यां, येन ब्रह्मवै चिन्तितम् ।
समं पष्यति सर्वत्र, गुरूवे श्री नान्तिने नमः ॥४॥
तस्यै वांशहि जीवोऽयं, मायया बहुरूप या
काय क्लेषान्वहुन्भुक्ते, गुरूवे नान्तिने नमः ॥५॥
गुरोः शिक्षामि माँ शुद्धाँ यः चित्ते धारयिस्यति ।
न कदापि जगज्जालैः मोहमेस्यति सः नर ॥६॥
।। इति श्री नान्तिन पंचक ।।
१०८ सिद्धगिरि श्री नान्तिन महाराज की जय




ब्रह्मानन्दं

ॐ ब्रह्मानन्दं परम सुखद केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्व धिः साक्षिभूतम्,
भावातीतं त्रिगुणारहितं सदगुरुं तं नमामि ||
ॐ गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वर ।
गुरु साक्षात् परमब्रह्म तस्मैय, श्री गुरुवेनमः ।।
ध्यान मूलं गुरु मूर्ती, पूजामूलं गुरु पदम्
मंत्र मूलं गुरुवाक्यम्, मोक्ष मूलं गुरु कृपा ।।
अखण्ड मण्डला कारम, व्याप्तऐन चराचरम्
तद् पदम् दृश्यतेन तस्मैय श्री गुरुवे नमः ।।
आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरे ।
सर्व देवो नमस्कारम् केशवम् प्रति गच्छति ।।
केशवम् क्लेश नाशाय दुःख नाशाय् माधव ।
हरि हरो पाप नाशाय गोविन्दाय, मोक्ष दायकम् ।।
मंत्र सत्यम् पूजासत्यम्, सत्यम देवो निरंजनम् ।।
गुरुर वाक्यम् सदा सत्यम्, सत्यम्, ऐको परमपदम् ।।
अन्यथा शरणम्, नास्ति, त्वमेव शरणम मम्।
तस्मात कारणभावेन, रक्ष रक्ष महेश्वरम् ।।
प्रातः काले शिवम् दृष्टवा निशा पापो विनश्यति
आजन्मान् कृति मध्यानि च्छायानि सप्त जनमनि ।।
मेरु कांचन तत्वानाम्, गवांग कोटि सतेरपि ।
पन्च कोटि तुरंगानाम्तत् फलम विश्वदर्शनम्।।
हरिः ॐ
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वम्, ममदेव देव ।।




।। श्री गुरु पादुका पंचकम् ।।

ॐ नमो गुरुभ्यो गुरु पादुकाभ्यो ।
नमः परेभ्यः पर पादुकाभ्यः ।।
आचार्य सिद्धेश्वर पादुकाभ्यो ।
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यः ।। १ ।।
ॐकार ह्रींकार रहस्य युक्ता ।
श्रींकार गूढार्थ महा विभूत्या ।।
ॐकार मर्म प्रतिपादिनिभ्यां ।
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम् ।।२।।
हौत्राग्नि हौत्राग्नि हविष्य होतृ ।
होमादि सर्वाकृति भासमानम् ।
यद् ब्रम्ह तद्बोध वितरिणीभ्याम् ।
नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ।। ३ ।।
कामादि सर्प व्रज गारुडाभ्याम् ।
विवेक वैराग्य निधि प्रदाभ्याम्।
बोधः प्रदाभ्यां द्रुत मोक्षदाभ्याम् ।
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम् ।।४।।
अनन्त संसार समुद्र तारा ।
नौकायिताभ्यां स्थिर भक्तिदाभ्याम् ।।
जाड्याब्धि संशोषण वाड्वाभ्याम् ।
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम् ।।५।।
इति श्री गुरु पादुका पंचकम् ।




।। लिंगाष्टकम् ।।

ब्रह्मामुरारिसुरार्चितलिंगम्, निर्मल भाषित शोभितलिंगम्।
जन्मजदुःख विनाशक लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ।। 1 ।।
देव मुनिप्रवरार्चितलिंगम्, कामदहं करुणाकर लिंगम् ।
रावणदर्प विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ।।2।।
सर्वसुगन्धिसुलेपित लिंगम्, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगम् ।
सिद्धसुरासुर वन्दित लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंग ।।3।।
कनकमहामणिभूषित लिंगम्, फणिपतिवेष्टित शोभित लिंगम् ।
दक्षसुयज्ञ विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ।। 4 ।।
कुंकुमचन्दनलेपित लिंगम्, पंकजहारसुशोभित लिंगम ।
संचितपाप विनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ।।5।।
देवगणार्चित सेवितलिंगम्, भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम् ।
दिनकरकोटि प्रभाकर लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ।।6।।
अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगम्, सर्वसमुद्भवकारण लिंगम् ।
अष्टदरिद्रविनाशन लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ।।7।।
सुरगुरूसुरवर पूजित लिंगम्, सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगम् ।
परात्परं परमात्मक लिंगम्, तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥8॥
लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।




परिक्रमा

मंत्र-
यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।
पापोहं पाप कर्माहं पापात्मां पाप सम्भव ।
त्रहिमाम् पार्वतीनाथ सर्वपाप हरो हरः ।।
( इस मन्त्र को कहते हुए परिक्रमा करें)


पुष्पांजलि
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च ।
पुष्पाञ्जलिर्मयादत्त गृहाण परमेश्वर ॥


धर्म की जय हो||
अधर्म का नाश हो||
प्राणियों मे सद्भावना हो
विश्व का कल्याण हो||